ये कविता हैं कुछ कहती हम सबसे, क्या नज़रें मिला पाएंगे हम अपने कल से
क्या यहीं सुन्हेरा भविष्य हैं तो बना रहे हैं, खबर पड़ी अखबार फेंका.. और ऑफिस जा रहे हैं..
ये कविता तो आगे लिखी हैं! एक आईना हैं खुद को दिखाने के किये, आसपास हो रही घटनाओ से विचलित मेरे मन की एक तलाश हैं! एक कोशिश हैं सत्य को पहचानने की, अपने आप से पूछने की, कि आखिर ये डर क्यूँ हैं.. खुद को जगाने कि .. शायद मेरे साथ कोई और भी जाग जाए..
उस तरफ मुर्दो कि बस्ती, इस तरफ कातिलों का मजमा,
और क़त्ल होने को मजबूर बीचों बीच खडे हम!!
हाल-ए-गुलिस्तान क्या होगा, जब बागबान भी हो दुश्मन,
जब चोर कोतवाल हो भाई भाई तो अब किससे कहे हम!!
हर ज़र्रा ले रहा राम नाम और हर कूचे में हैं मातम,
बना लाश खडा हर शक्श ओढे बुज्दिल्ली का कफ़न!!
मजबूर की मजबूरी उसकी आँखों में देखो,
पड़ी हैं बेटी की लाश और उसपे कपडे कम!!
वो हाथ हैं बूढे ओ उठ नहीं सकते,
नहीं हैं कफ़न का सामन लाश को ढक नहीं सकते!!
गर आज ढक भी दे तो वो कफ़न नोच लेंगे,
अखबार कचहरी में उसकी इज्ज़त रौंद देंगे!!
ऐ-लाश बने लोगों एक बार तो जी लो,
चाहे मिले चंद लम्हे गर्व की सांस तो तुम लो!
उठो और बोलो अब हम नहीं सहेंगे,
ऐ क़त्ल करने वाले तेरे मुहल्ले में घर लेंगे !!
हिम्मत हो तो नज़र उठाना इस तरफ,
अब बंधे नहीं हाथ, तेरी आँखें नोच लेंगे, तेरी आँखे नोच लेंगे!!
धन्यवाद!! उठो देखो और सोचो, ये ज़मीन हमारी हैं ये वतन हमरा हैं, और जो मर रहा हैं सड़क पे वो हमवतन हमारा हैं!!